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गणतंत्र की समीक्षा

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१५ अगस्त और २६ जनवरी ये दो तारीखें…प्रत्येक वर्ष आती हैं. बचपन में मिठाई मिलने की आशा में उत्साह होता था. फिर धीरे -धीरे यह समझ आने लगा कि यह देश से सम्बंधित महत्वपूर्ण अवसर है. कुछ लोग राष्ट्रीय पर्व कह देते हैं. अब नौकरी पर होने के नाते सरकारी ड्रिल मात्र लगती है. कुछ लोग कहेंगे यह राष्ट्रवादिता जैसा कथन नहीं. कुछ इसे सम्मान जनक नहीं मानेंगे …किन्तु बहुत ज़रूरी है कि हम सोचें …आज ही नहीं हमेशा अपने देश और अपने लोगों के लिए ( भारतवासियों के लिए) क्या यह उचित है कि हमारा आचरण हमारे दिखावे से मेल न खाता हो? हम दिखावा करें राष्ट्रीय ध्वज के सामने तन के खड़े होने का…बाद में राष्ट्र हित से सम्बंधित कार्यों को करते हुए…उजागर हों…घूसखोरी की बात, भ्रष्टाचार की दास्ताँ, चोरी लूट ह्त्या बलात्कार, सामूहिक दुराचार, देश की सुरक्षा से खिलवाड़, राष्ट्र-विरोधी बयान …

गणतंत्र में सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति हो या सबसे साधारण से लगने वाले असाधारण व्यक्ति का योगदान सब को महत्व दिया जाना चाहिए. किन्तु ऐसा सैद्धांतिक रूप से दिखाई देता है.. भारत का संविधान भी ऐसा आश्वासन नागरिकों को देता है. सामान न्याय, समता पर आधारित समाज, सभी को आगे बढ़ने के अवसर …

किन्तु आरक्षण, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार, असमान न्याय, असामान क़ानून, समाज के कुछ वर्गों कुछ विशेष सुविधाएं, विकास के नाम पर विदेशियों को यहाँ फिर से लूट मचाने की छूट, कंक्रीट के जंगल को विकास बताना, केवल धनवान लोगों को ही गणतंत्र में अपने लिए आगे रख पाने की सहूलियत

असंतोष को जन्म देती है. गणतंत्र का यह स्वरुप अब समीक्षा किये जाने लायक है और केवल समीक्षा ही नहीं …तत्पश्चात परिवर्तन भी अवश्यम्भावी है.



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